Friday, September 14, 2007

कीड़े को लगा कीड़ा

मांसाहारी और मैं...जी मैं तो पूरी की पूरी शाकाहारी हूं। हां, कभी कभी अंडा और मछ्ली खा लेती हूं। लेकिन इसे आप मांसाहार समझने की भूल कदापी ना करें। क्योंकि जो इसे मांसाहार कहेंगे उनसे मेरा झगड़ा हो जाएगा। भई आप क्या दही नहीं खाते, उसमे भी तो कीड़े होते हैं, आई मीन बैक्टिरिया। बेचारे ज़िंदा ही होते है जब आप उन्हें बड़े स्वाद से निगल जाते हैं। अब ये तर्क मत दीजिए की आप उन्हें देख नहीं पाते सो निगल जाते हैं। और उसका क्या जो शाक-पात आप खाते हैं, उनमें भी तो जीव है।

खैर, मुझे पता है आपके पास भी कई तर्क होंके लेकिन इसमें तो घंटों बीत सकते हैं। वैसे मेरी प्योर वेजीटेरियन मम्मी इस तर्क से बिल्कुल परे हैं। जब ये बहस सुनी तो तपाक से बोली, "दही का कीड़ा अच्छा कीड़ा होता है। उसे खाने से इंसान को नुकसान नहीं फायदा होता है। और रही शाक-पात की बात तो उनका जीव तो बना ही खाने के लिए है। ये सभी अच्छे कीड़े हैं, इंसान को ताकत देते हैं और ताकत से ही वो अपने सारे काम आसानी से कर पाते हैं" ।
अरे वाह....ये भी कोई बात हुई भला, ये अच्छा कीड़ा और गंदा कीड़ा कहां से आ गया। फायदेमंद कीड़ा, वाह क्या तर्क है। लेकिन उनसे बहस भला कौन करे, जो कह दिया सो कह दिया।

कल उस अच्छे कीड़े की बात पर हंसी आती थी, और मेरी तरह आप भी ज़रूर मुसकुरा रहे होंगे। लेकिन आज सच लगती है। हां, संदर्भ ज़रूर बदल गया है। लेकिन बात वही है। अच्छा कीड़ा - गंदा कीड़ा....एक ताकत देता है तो दूसरा कमज़ोर बनाता है। एक जोश है, उमंग है तो दूसरा थकान और बैचेनी है। एक सही है तो दूसरा गलत। अच्छा कीड़ा - गंदा कीड़ा.........

मगर क्या हो जब कीड़े को भी कीड़ा लग जाए? बात अजीब ज़रूर है, लेकिन है पते की। कल ही मेरे दादाजी गांव से लौटे। 85 साल के हैं, आंखे कमज़ोर है सो टीवी देखते नहीं सुनते हैं और खबरों की सारी जानकारी रखते हैं। आज खटाखट खबरों के ज़माने में भी दूरदर्शन ही पसंद है। कहते हैं, खबरें दिखाते हैं दूरदर्शन वाले। बाकी सब दिखाते नहीं बनाते है।
अब मै ठहरी इसी बिरादरी की, सो प्रोटेस्ट किया, 'दादाजी ऐसी बात नहीं है, सभी चैनल एक से नहीं। सबका अलग एजेंडा है'। तो बोले, हां एजेंडा अलग है लेकिन बात तो वही है। एक कहता है- ख़बर हमारी, फैसला आपका और उसकी खबर देखकर लोग इतने भड़क जाते हैं कि आंखमूंद कर देश में दंगे भड़काने का फैसला ले लेते हैं। तो दूसरा देश बदलने के लिए चैनल बदलने को कहता है और ब्रैकिंग न्यूज़ कहकर दिखाता क्या है कि पति-पत्नी के लिए सैक्स कितना ज़रूरी है। और तुम्हारा वो तेज़ चैनल, वाकयी में बड़ा तेज़ है, खबरें सबसे पहले उसी के पास पहुंचती है। ऐश्वर्या राय ने कहां उन्हें बच्चे बहुत पसंद हैं। बस ये तेज़ी से समझ गए कि वो मां बनने वाली हैं। शुक्र है लोगों से वोटिंग नहीं करायी कि छोटे बी के घर लड़का होगा या लड़की। सरौता वाले बाबा की खबर देखी थी इनके चैनल पर। थोड़े दिनों बाद खबर आई कि भगदड़ मच गई है वहां। कई लोग मारे गए। बेचारे वो आस्थावान जिन्होंने इनके चैनल से सुना की कोई बाबा आंखों का सफल इलाज कर रहे हैं। पहुंच गए पूरे दलबल के साथ। और आंखों के बदले अपनी जान गवानी पड़ी।

एक कहता है कि वो हर कीमत पर ख़बर दिखाएगा लेकिन जब चैनल खोलो तो स्डूडियो में दो मेहमान आपस में बुरी तरह भिड़ते नज़र आते हैं। एंकर समझ जाता है कि झगड़ा हो रहा है सो इसे पूरा फुटेज दो, यहीं वो समय है जब लोग चैनल बदलते हुए यहां रुक जाएंगे। फिर रोने की लंबी ब्रीद, कैमरे का फोकस आखों के ठीक पास। जब एक पार्टी थोड़ा चुप होने लगती है तो एंकर कहता है, बोलिए शालू जी बोलिए, आखिर क्यों आपका पति आपको प्यार नहीं करता। आप यहां जी भर के अपनी बात रख सकती हैं। अपने पति की हर बात हमें बता सकती हैं। हमारे पास सामाजिक कार्यकर्ता है, महिला विषय की जानकार है और कानून के धुरंदर हैं। आपको हम न्याय दिलाए बिना कोई खबर नहीं दिखाएंगे। क्यों आपका पति आपको तलाक देना चाहता है। हम कराएंगे आपका सेटेलमेंट। बोलिए शालू जी बोलिए। शालू जी बेचारी क्या करें, रोना छूटते ही बोलती बंद। समझदार एंकर फिर समझ जाता है, माहौल अभी थोड़ा ठंडा पड़ रहा है। ब्रेक में थोड़ा शालू जी को समझा दूंगा तो काम बन जाएगा।

और वो क्या कहते है उसे बाबाओं का प्रोगराम, काल-कपाल-महाकाल। गांव में उस कार्यक्रम को देखने के लिए मजमा लग जाता है। विज्ञान पर आस्था जो भारी पड़ जाती है। गांव वाले ठहरे आस्थावान। बाबाओं की बात डॉक्टर से पहले समझ जाते हैं। इस कार्यक्रम से तो बाबाओं का बाज़ार ही चल निकला है। टीवी वाले बाबाओं को देखकर गांव के बाबा ने भी अपना हुलिया बदल लिया है। अब अपने प्रमोशन में कह रहे हैं कि, हमारे यहां टीवी पर दिखाए गए बाबा जैसा इलाज़ होता है। सारी दुनिया के सताए यहां आएं। और जनता ठहरी आस्था में विश्वास रखने वाली और अबतो टीवी का सर्टीफिकेट भी मिल गया है।

दादाजी बिना रुके बोले जा रहे थे और मैं शब्दहीन खड़ी मन में उस कीड़े की अलग अलग आकृतियां बना रही थी। बोले, "कीड़ा देखा है तुमने कभी, काट ले तो जख्म कर देता है। और अगर ज़हरीला हो तो ज़हर सारे शरीर को गलाने लगता है। लेकिन आज उस कीड़े को ही कीड़ा लग गया है। मीडिया एक कीड़ा ही तो है। सच का कीड़ा, जो काटता है तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है। सोच का कीड़ा, जो अपने दांत भी गड़ा देता है तो इंसान सही और गलत को समझने लगता है। जोश का कीड़ा, जो कुलबुलाता है तो इंसान अपने अधिकारों के लिए भगवान से भी लड़ जाता है। ताकत का कीड़ा, जो गूंगे की आवाज़ है, अंधे की आंखे और लंगड़े के पैर। लेकिन आज इस कीड़े को भी कीड़ा लग गया है। जो सच तो दिखाता है लेकिन दूध ज़हर बन जाता है। सोचने को मजबूर तो करता है लेकिन लोगों की सोच दंगा भड़का देती है। जोश में आकर लोग खुद पर मिट्टी का तेल तो छिड़क लेते हैं लेकिन कैमरा सामने से हटते ही, उन्हें कोई पतली गली नज़र आ जाती है। ताकत तो देता है लेकिन जेल में पड़े उन नेताओं को जो वहीं से अपना धंधा चला रहे हैं और उनका बाल भी बांका नहीं हो पाता। बबलू श्रीवास्तव हो या अबु सलेम मीडिया में आना ही इनकी ताकत है। पचास करोड़ का इनाम रखने वाले यूपी के मंत्री हाजी याकूब कुरैशी को किसने ताकत दी? क्या आप समझते हैं मीक्का के किस ने राखी सावंत को पॉपुलर बनाया?"

इतना सब सुनने के बाद, उस कीड़े की एक आकृति बनी मेरे मन में। लेकिन कीड़े को कौन सा कीड़ा लगा भला। बड़ा ही अजीब कीड़ा है जो कीड़े को ही लग गया। दादाजी शायद समझ गए थे मेरी उलझन बोले, " इसे टीआरपी का कीड़ा कहते हैं। लाइलाज नहीं है। लेकिन अगर एक बार लग जाए तो बड़ी मुश्किल हो जाती है। फिल्मवालों को लगता है तो हिरोइनों के कपड़े कम से गायब हो जाते हैं। सास-बहू वाले चैनलों को लग जाए तो एक की बजाए चार चार शादियां करवाने लगते हैं। मौत के बाद कई बार री-एंट्री और बीच बीच में फिल्मी गानों पर नाचती फेवरेट जोड़ियों का तड़का। नेताओं को लग जाए तो कैमरा ऑन होते ही नारे चालू और कभी कभी तो एक दूसरे पर कुर्सी, माइक, और टेबल तक बरसाने लगते हैं। न्यूज़ चैनल वालों को लगे तो स्टिंग ऑपरेशनों के ज़रिए सच का झूठ और झूठ का सच दिखाने लगते हैं। और तो और अगर इस सो कॉल्ड "भोली भाली" जनता को ये कीड़ा लग जाए को शहर के शहर तबाह हो जाते हैं। आसमान से आग बरसने लगती है। कहीं पत्थर फैंके जाते हैं को कहीं लाठियां भांजी जाती हैं"।

मुझे आंखे झुकाए देख दादाजी बड़े प्यार से बोले घबराती क्यों हों, कीड़े को कीड़ा ही तो लगा है। कुछ समय बाद शायद उस कीड़े को कोई अच्छा कीड़ा लग जाए। वो बात सुनी है ना तुमने अच्छा कीड़ा- गंदा कीड़ा।



9 comments:

Sagar Chand Nahar said...

शैलीजी
आपकी कही सुनी तो नहीं पढ़ी हमने। चैनलों वाले तर्क से सहमत हूँ पर दही वाले कीड़े से नहीं। कुछ चीजें हमारे खाने के लिये लिये बनी है कुछ जानवरों के लिये और कम से कम मांसाहार के तो इन्सानों के लिये कतई नहीं। और शाक सब्जी इन्सानों के लिये ।
अब देखिये शेर घास नहीं खाता और गाय भेंस मांसाहार नहीं करते और इन्सान ... उसे सब कुछ चल जाता है।
इस विषय पर मैं आपको १०० तर्क दूंगा कि मांसाहार इन्सानों के लिये नहीं है तो शायद आप एक सौ एक तर्क भी दे दें कि मांसाहार उचित है, लेकिन इससे सत्य झुठलाया नहीं जा सकेगा।
एक बात और इन्सानों ने डोडो की तरह कई प्राणीयों का अनाप शनाप शिकार कर उन प्राणीयों का अस्तित्व ही कत्म कर दिया कल को मछलियाँ और अंडे देने वाली मुर्गियाँ खत्म हो गई फिर क्या मांसाहारी लोग इन्सानों का शिकार करेंगे।
दूध में मिलावट का रोना रोज सुबह रोते हैं पर हम यह भूल जाते हैं कि हम उन दूध देने वाले प्राणियों को खाकर अपने लिये दूध की कमी कर रहे हैं और इससे मिलावट बढ़ रही है।
खैर ... बहुत लम्बा हो गया है जवाब।
आपने लिखा कि आप मांसाहारी नहीं है इस बात से भी सहमत नहीं झगड़ा करने की हिम्म्त भी नहीं मुझमें।
आपके मन को दुखाने की मंशा नहीं है फिर भी अन्जाने में कुछ दिल को दुखे ऐसी बात लिख दी हो तो क्षमाप्रार्थी हूं।
॥दस्तक॥
गीतों की महफिल

Divine India said...

सच का कड़वा प्याला रख दिया आपने…
बहुत सुंदर तर्क एक मनोवैज्ञानिक समालोचना किया आज की मीडिया का और उसके बदलते नजरीए का मात्र टी आर पी के चक्कर में इतना सबकुछ एक रणनीति किया जाता है…।

arnab said...

ab aya ishtyle pakar me.....

jio guru.....fatafati!!!!

उमाशंकर सिंह said...

बेहतरीन!

Girindra Nath Jha/ गिरीन्द्र नाथ झा said...

maza aa gya,,,,,,,,,,,,,
waha..Guru..man gyae

Anonymous said...

bahut khoob. ek aam admi ki jubani electronic media ki wo sachi kahani likh dali jise jante hue bhi hum sirf chanel badal dete hai tv off nahi karte.

shashwati

रवि सुंदरम said...

शैली, आपका ब्लाग देखा, अच्छा लगा, खास तौर पर चैनलों पर जो आपने लिखा है. मैं बैंगलोर में एक पोर्टल में एडीटर हूं, हमारी साइट हैं
http//:thatshindi.oneindia.in
www.aol.in/hindi
हम इंटरनेट पर हिन्दी में अच्छा लिखने वालों की तलाश में हैं. क्या आप हमें आलेख भेजना पसंद करेंगी. मुझे मेल करें
dinesh.s@greynium.com

Unknown said...

Shailijee..kaisee hain aap.. bus yun hee ghumte ghumte aapke iss blog par nazar parhee.. aap bto shuroo se hee bahut achchha likhatee hain...lekin ye kram jaaree rahna chahiye..dhanyawad
Hitendra Gupta

travel30 said...

bahut ache.. Dada ji ne sahi kaha ekdum.. Hamare aaj ke news channel to hamare vaighyaniko se aage nikal gaye hai. kisi ko swarg ki seedhi mil gayi hai aur kisi ko Shankar ji mil gaye hai. aur in sabhi par char chand lagata hai hamara pyara India Tv. unhe to bhagwaan direct contact kar lete hai aur khabre bata dete hai Rohit Tripathi http;//rohittripathi.blogspot.com